धर्म का धन : श्रद्धा की अमानत, स्वार्थ का साधन नहीं – श्रमण डॉ पुष्पेन्द्र

समाज की सबसे बड़ी शक्ति यदि कोई है, तो वह उसकी आस्था है। धन, सत्ता, ज्ञान और संसाधन समय के साथ बदल सकते हैं, परंतु जिस समाज की आस्था जीवित रहती है, वह समाज हर संकट से उबरने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि मंदिर, स्थानक, तीर्थ, उपाश्रय और धर्मस्थल केवल ईंट-पत्थरों से निर्मित भवन नहीं होते, बल्कि वे करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा, तप, त्याग और विश्वास के जीवंत केंद्र होते हैं।

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