संथारासाधिका उपप्रवर्तिनी प. पू. डॉ प्रियदर्शनाजी म. सा. के तीसरे मनोरथ का सोलहवां दिवस !

पुणे, पुण्यनगरी में कोथरूड जैन स्थानक में उपप्रवर्तिनी प. पू . डॉ प्रियदर्शनाजी म. सा . इनका सजग संथारा अपने आप में जिनशासनकी महिमा है , करिश्मा है , पांचवें आरे मे चवथे आरे के संथारे का मुर्तिमंत उदाहरण है ! महासतीजी की साधना में इतना प्रभाव है कि संथारा लेते ही तबीयत में सुधार आ गया ! जैन आगम के मान्यता के अनुसार तीन मनोरथ का बड़ा महत्व होता है । अपरिग्रह, संतत्व की दीक्षा एवं संलेखना मरण , महासतीजी ने इनमें से दो मनोरथ तपस्या, साधना, जिनशासनकी प्रभावना और स्वाध्याय के साथ पुरे किये और तिसरे मनोरथ का साहसी संकल्प भी सजग एवं जागृत अवस्था में प्रसन्नता के साथ किया है !

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