पुणे, आगमकालिन श्रावक समान आदर्श जीवन, संप्रति राजा सम संत महापुरुषों का पुना क्षेत्र में निरंतर शय्यादान देने वाले, अखिल भारतीय समरथ जैन श्रावक संघ के संरक्षक, हम सभी के लिए जिता जागता आचारांग ऐसे मेहता आराधना केंद्र के स्थान प्रदाता आदरणीय श्रद्धेय श्री भवरलालजी सा मेहता का जीवन परिचय ..
मरुधर में साधडी मेहता परिवार के लाल.. ऊम्र करिब – ८६
साहिणे चयही भोए-सेहु चाई त्ती ऊच्चई ।।
पुण्यवानी से – सभी प्रकार की साधन सामग्री, सुसंपन्न अनुकूलता होने पर भी मर्यादित जीवन में अपनी चर्या में रहते हुए
आप अपने जीवन का ऊत्तरार्ध निकटतम भव्यता एवं सफलता के लिए प्रशस्त किया । स्वर्गिय अंटी जी को परलोक सिधारे करिब पांच वर्ष हो गए। अपने एकांत समय को केवल आत्म कल्याण के कार्य हेतु समर्पित करते हुए जीवन का प्रत्येक क्षण हितकारी बनाया।
गाड़ी, बंगला,नौकर चाकर रखकर आराम से जीवन जीने के लिए सक्षम होते हुए भी – एक साधारण से फ़्लैट में ८५ की ऊम्र में भी स्वयं का प्रत्येक कार्य स्वयं करते हुए अपनी पुण्यवानी को खर्च नही किया।
आप के जीवन के उल्लेखनीय बिंदु जो जानने, समजने एवं आदरने योग्य है –
-बहुत ही सादगी भरी जीवन शैली।
-दोपहर दो बजे बाद कोई भी आहार नहीं।
-करिब करिब सभी फलों का अजिवन त्याग।
आजीवन बड़ी स्नान के त्याग (वर्ष में २/३ बार की छुट।
-किसी भी प्रकार का बहुमान-सम्मान सत्कार- स्विकार नहीं करते, कही पर भी अभिभाषण हेतु आगे नहीं आते।
आवश्यकता होने पर अपने विचारों को किसी और के द्वारा कहलवाते थे।
नाम प्रसिद्धि की कामना से कोसों दुर।
जो जो आज के समय में बहुत ही दुष्कर है।
-महापुरुषों की सेवा, वैद्यकिय चिकित्सा में सदैव तत्पर।
-संपुर्ण वर्ष में २ से अधिक वेष का त्याग।
-अन्यत्र – अनुकूल वास्तु उपलब्ध होने पर भी पौषध शाला के पास ही रहने की भावना- निरंतर महापुरुषों का समागम, सुपात्रदान का अवसर, वैय्यावच्च का अवसर।
-समय मात्र का भी प्रमाद नहीं।
अधिकांश समय सामाईक संवर में।
-संपुर्ण भारत वर्ष में समरथ भवन निर्माण में विशेष आर्थिक सहयोग।
आप के जीवन के सद्गुणों पर कई किताबें बन सकती है। जिनशासन के गौरवशाली इतिहास के पन्नों पर आप के गुणानुवाद सुवर्ण अक्षरों में विद्यमान रहेंगे।
शासन कार्य में यथा संभव समर्पण देने वाले बहुत है , किंतु अपना तन -मन – धन सभी प्रकार के समर्पण देने वाले आप जैसे विरले ही होते हैं ।
धर्म की राह पर अग्रसर रही हुई आप की आत्मा शीघ्र ही चरम लक्ष को प्राप्त करे यही मंगल भावना।
किरण कुमार लोढ़ा, पुणे