सेवा को हार नहीं उपहार समझिए। भगवान महावीर के शिष्य गौतम स्वामी ने एक बार भगवान से पूछा भगवान एक साधक तप कर रहा है और एक साधक सेवा कर रहा है तो दोनों में से किसकी प्रधानता ज्यादा है, किसकी पुण्यवाणी ज्यादा बढ़ती है ? तब भगवान ने कहा तपस्या करके हम सेवा कर सकते हैं तो बहुत अच्छा, लेकिन तप करके हम सेवा नहीं कर सकते तो हमें सेवा को महत्व देना चाहिए। सेवा से तीर्थंकर नाम गोत्र का बंध होता है। घर में सासु बीमार है या घर का व्यक्ति बीमार है और यदि हम तपस्या करते हैं तो भगवान ने कहा ये धर्म नहीं हैं। सेवा को ज्यादा महत्व दो।
जैन सिद्धांत में भूखे रहकर केवल उपवास करना ही धर्म नहीं है बल्कि दूसरों की सेवा करना भी धर्म है, सेवा भी 12 तप के प्रकार में से एक तप है। सेवा में “स” कहता है – कोई स्वार्थ नहीं चाहिए कि मैं सेवा करूंगा तो मुझे कुछ मिलेगा, कोई स्वामित्व नहीं चाहिए अर्थात मैं सेवा कर रहा हूं तो मैं बोलूं वैसा ही होना चाहिए या कोई स्मृति नहीं चाहिए कि मैने यह किया। सेवा का “वा” कहता हैं – वात्सल्य भाव, विनय भाव, विवेक भाव चाहिए।
परमात्मा ने पांच प्रकार की सेवा का वर्णन किया है –
1) माता-पिता की सेवा – जिस घर में माता-पिता की सेवा होती है उस घर में सर्वार्थ सिद्धि का चौघड़िया बन जाता है और जहां पर माता-पिता की सेवा नहीं होती उस घर का अमृत का चौघड़िया भी काल का चौघड़िया बन जाता है। सेवा से परमात्मा खुश हो जाते हैं। जिस घर में माता-पिता हंसते हैं, उस घर में परमात्मा बसते हैं। पूरे दिन में हमने कम से कम एक गिलास पानी तो भी माता-पिता को देना चाहिए और रोज उनके पास जाकर आपको क्या चाहिए यह अवश्य पूछना चाहिए।
2) गुरुजनों की सेवा – गुरु के चरणों में हमारा जीवन समर्पित चाहिए। गुरु की जघन्य अर्थात कम से कम सेवा होती है गुरु की आज्ञा का पालन करना और उत्कृष्ट सेवा गुरु की राह पर चलना। केवली भगवान भी गुरु की सेवा करते हैं तो हमें तो गुरुजनों की सेवा करनी ही चाहिए। गुरु हमारे जीवन की दशा ही नहीं, दिशा भी सुधारते हैं।
3) साधर्मी सेवा – रसोई बनाते समय हमने एक मुट्ठी चावल, एक मुट्ठी आटा बाजू में निकाल कर रखना चाहिए। जिस दिन वह डिब्बा भर जाए, उस दिन किसी जरूरतमंद के यहां पर चुपके से रख देना चाहिए। पेथड़ शाह का नियम था कि जब तक वह किसी जरूरतमंद को खाना नहीं खिलाते वह स्वयं भोजन नहीं करते। इसलिए वह रोज रथ पर जाकर किसी जरूरतमंद को ढूंढते रहते और उसे खाना खिला कर ही भोजन करते।
4) दुखी रोगी की सेवा – दुखी और रोगी व्यक्ति की सेवा करना परम धर्म है! जब कोई व्यक्ति पीड़ा में होता है, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, उसकी सहायता करना मानवता का सबसे बड़ा कार्य है. ऐसे समय में, रोगी को दवा, भोजन और उचित देखभाल प्रदान करना उसे नया जीवन दे सकता है! दुखियों के प्रति करुणा और सहानुभूति का भाव रखना और उनकी हर संभव मदद करना, जैन धर्म के सेवा भाव के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है। यह केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक पुण्यकारी कार्य है जो व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
5) शासन की सेवा – शासन की सेवा अर्थात धर्म की प्रभावना करना। जिस तरह कृष्ण भगवान, श्रेणिक राजा ने शासन की सेवा करके तीर्थंकर नाम कर्म बांध लिया था। हम भी ज्यादा से ज्यादा लोगों को सदमार्ग में जोड़ने का अवश्य प्रयत्न करें।