बहुत पुराने समय की बात है। एक राज्य में मृगावती नाम की राजकुमारी रहती थी। वो बेहद सुंदर, बुद्धिमान और दयालु थी। सारा राज्य उससे प्रेम करता था।
एक दिन राज्य में एक दूसरे राज्य की राजकुमारी आई — नाम था सुनंदा। सुनंदा के मन में मृगावती के प्रति ईर्ष्या थी क्योंकि सारे लोग मृगावती की प्रशंसा करते थे। सुनंदा ने कुछ दासियों को लालच देकर मृगावती के बारे में झूठी अफवाहें फैलवाईं।
धीरे-धीरे ये बातें राजा तक पहुंची। राजा क्रोध में आ गए और बिना सच जाने मृगावती को राजमहल से निकाल दिया।
मृगावती के पास न धन था, न आश्रय। वो जंगल की ओर चल पड़ी। रास्ते में एक जैन मुनि मिले। उन्होंने मृगावती का दुखी चेहरा देखकर पूछा – ” बेटी, क्या हुआ ? “
मृगावती ने सारी कहानी सुनाई।
मुनिराज ने पूछा –” और तुम्हारे मन में सुनंदा के प्रति क्या भाव है ? “
मृगावती ने एक पल सोचा। फिर बोली – ” मुनिराज, मैं नहीं जानती कि उसने ऐसा क्यों किया। शायद उसके मन में कोई गहरा दुख था। मैं उससे नाराज़ नहीं हूं। “
मुनिराज की आंखे भर आईं। उन्होंने कहा –” बेटी, तुमने आज वो पाठ पढ़ा जो बड़े-बड़े राजा नहीं पढ़ पाते। क्षमा करना कमज़ोरी नहीं — यह आत्मा की सबसे बड़ी शक्ति है। “
मुनिराज ने मृगावती को धर्म की शिक्षा दी। कुछ वर्षों बाद सत्य सामने आया। दासियों ने स्वयं कबूल किया कि सुनंदा ने उन्हें लालच दिया था।
राजा ने क्षमा मांगी। मृगावती वापस आई। पर अब वो पहले से भी शांत और प्रसन्न थी – क्योंकि उसने क्षमा की असली शक्ति को जी लिया था।
और सुनंदा? मृगावती ने स्वयं उसे गले लगाया और कहा – ” जो बीत गया, वो बीत गया। अब हम मित्र हैं। “
शिक्षा : क्षमा का अर्थ यह नहीं कि जो हुआ वो सही था। क्षमा का अर्थ है – उस बोझ को उतारना जो हमारा मन लिए घूमता है। भगवान महावीर ने कहा – ” क्षमा वीरस्य भूषणम् “ – क्षमा करना वीरों का आभूषण है।
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