किसी समय राजगृही नगरी में भगवान महावीर के समवसरण में दर्दुर नाम का एक महर्धिक देव आया और भगवान को वन्दन कर वापिस चला गया। गौतम ने उसके पूर्वजन्म का परिचय पूछा तो श्रमण भगवान महावीर ने कहा-”यह दर्दुरदेव राजगृही के नन्द मणिकार सेठ का जीव है। श्रावक धर्म की विराधना कर अन्त समय में कुष्ठादि रोगों से पीड़ित नन्द बावड़ी में आसक्त रह मूर्छित होकर काल प्राप्त किया इसलिए उसी बावड़ी में मेंढक रूप से जन्म लिया।”
कुछ समय के बाद जब आगत लोगों से नन्द मणिकार की प्रशंसा और महिमा सुनने लगा तो उसके मन संकल्प उत्पन्न हुआ और चिन्तन करते हुए उसने जातिस्मरण ज्ञान की प्राप्ति कर ली। उसने सोचा कि, मैंने श्रमण भगवान महावीर के पास श्रावक धर्म ग्रहण किया था पर साधु दर्शन के अभाव से मिथ्यात्व को प्राप्त कर आर्त्तध्यानवश मेंढक योनि में आ गया हूँ। जीवन – सुधार के लिए मुझे श्रावक व्रत धर्म की आराधना करते हुए निरन्तर बेले की तपस्या और पारणा में पुष्करिणी के किनारे प्रासुक स्नान आदि के जल एवं मिट्टी से जीवन निर्वाह करना चाहिए।
मेंढक ने प्रतिज्ञा के अनुसार बावड़ी में भी साधनामय जीवन बिताना चालू कर दिया। संयोग से एक समय भगवान महावीर नगरी के उद्यान में पधारे। उनके वन्दन को जाते हुए बहुत से लोगों ने बावड़ी पर पानी लेते हुए बातचीत के प्रसंग में कहा- “देर करना ठीक नहीं। जल्दी से जल्दी प्रभु दर्शन के लिए चलना चाहिए।”
दर्दुर के मन में भावना जगी कि, मुझे भी प्रभु के चरणों में वन्दना करने को जाना चाहिए। वह धीरे-धीरे बावड़ी से निकल कर राज मार्ग पर आया और उद्यान की ओर बढ़ चला। इधर महाराज श्रेणिक की सवारी भी उसी पथ पर होकर चली। उस विशाल जन समूह के बीच में बेचारे क्षुद्र मेंढक का क्या पता ? वह एक घोड़े के खुर के नीचे आ गया और कुचला गया। शरीर से असमर्थ होकर भी वह मनोबल से समर्थ था। अतएव सड़क के एक किनारे होकर प्रभु के चरणों में आत्मनिवेदन करते बोला-‘“अर्हन्तादि भगवन्तों को नमस्कार हो तथा सिद्धि प्राप्त करने वाले भगवान महावीर को भी।” इस प्रकार उसने प्रभु की साक्षी से सभी प्रकार के पापों का परित्याग कर दिया और जीवन भर के लिए सम्पूर्ण आहार का त्याग कर, बिना किसी पर राग-रोष लाये समाधि-पूर्वक जीवन लीला समाप्त की ।
गौतम ! दर्दुर जन्म की उसी साधना का यह फल है कि, यह इतनी बड़ी ऋद्धि का स्वामी बना है और एक भव करके महाविदेह क्षेत्र में सम्पूर्ण कर्मों का क्षय कर सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो सिद्ध पद का अधिकारी बनेगा।
शुद्ध मन से अन्तकाल में जैसी भावना करता है, उसका वैसा फल भी प्राप्त करता है। जैसे मेंढक अपनी चाल से भगवान महावीर की वन्दना के लिए चला और बीच के रास्ते में ही मर गया। वह भगवान की वन्दना भी न कर सका । किन्तु शुद्ध भावना के कारण दर्दुर नाम का देव बन गया। इस तरह आचरण के बिना भी उच्च भावना फलवती हुई।