भय से मुक्ति, आत्मा की शांति – एक श्राविका का अंतिम प्रस्थान !

चंपा नगरी में चिलाती नाम की एक वृद्ध महिला रहती थीं। वे जैन धर्म की परम श्राविका थीं। जीवनभर उन्होंने अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह का पालन किया था।

जब उनकी आयु बहुत अधिक हो गई और शरीर कमज़ोर पड़ने लगा, तो उन्होंने एक निर्णय लिया — सल्लेखना (संथारा) लेने का।

उनके पुत्र रोने लगे — “माँ, ऐसा मत करो।”

चिलाती ने प्रेम से उनका हाथ थामा और कहा — “बेटा, जन्म जितना स्वाभाविक है, मृत्यु भी उतनी ही स्वाभाविक है। जो इसे जानता है, वो न जीवन से डरता है, न मृत्यु से। मैंने जीवनभर अपने कर्मों को शुद्ध करने की कोशिश की। अब अंतिम समय में मैं पूर्ण शांति के साथ जाना चाहती हूँ।”

पुत्र ने पूछा — “माँ, क्या तुम्हें डर नहीं लगता?”

चिलाती मुस्कुराईं — “बेटा, डर उन्हें लगता है जिन्होंने जीवन में कुछ अधूरा छोड़ा हो। मैंने किसी को कष्ट नहीं दिया, किसी से झूठ नहीं बोला, जो था वो बाँट दिया। अब क्या डर?”

उन्होंने अन्न-जल का त्याग किया। शांत भाव से मंत्र जपती रहीं। सारा परिवार पास बैठा रहा।

अंतिम समय में उन्होंने कहा — “जैन धर्म ने मुझे जीना सिखाया — और मरना भी। यही इस धर्म की सबसे बड़ी देन है।”

और शांत भाव से उनके प्राण निकले।

उनके पुत्र ने बाद में एक जैन मुनि से कहा — “मुनिराज, माँ तो बड़े आराम से गईं। उनके चेहरे पर एक शांति थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।”

मुनि ने कहा “यही जैन धर्म का लक्ष्य है — इस प्रकार जीना कि अंत भी उत्सव बन जाए।”

शिक्षा : सल्लेखना जैन धर्म में आत्म-हत्या नहीं, बल्कि आत्म-विजय है। यह मृत्यु का भय नहीं, जीवन की पूर्णता है। भगवान महावीर ने हमें सिखाया — जिसने जीना जान लिया, उसने मरना भी जान लिया।

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