आदिनाथ भक्तामर हीलिंग सेंटर का पाँचवाँ वर्धापन दिवस: विज्ञान और जैन दर्शन के संगम का भव्य उत्सव

आदिनाथ भक्तामर हीलिंग सेंटर के पाँचवें वर्धापन दिवस के अवसर पर आयोजित भव्य कार्यक्रम में लगभग 900 सदस्यों की गरिमामयी उपस्थिति ने इस सेवा-यात्रा को ऐतिहासिक आयाम प्रदान किया। यह आयोजन केवल वर्षगाँठ नहीं, बल्कि श्रद्धा, साधना और उपचार की पाँच वर्षीय निरंतर तपश्चर्या का उत्सव था।

कार्यक्रम का प्रारम्भ मंगलाचरण एवं गुरुवंदना के साथ हुआ। सेंटर की समर्पित साधिकाएँ आदरणीया सुजाता जी
सिंघवी, सीमाजी सेठिया एवं स्नेहलजी चोरडिया पिछले पाँच वर्षों से ऑनलाइन, ऑफलाइन हीलिंग प्रदान कर तथा
घर-घर जाकर भक्तामर अनुष्ठान के माध्यम से समाज को आध्यात्मिक एवं भावनात्मक संबल प्रदान कर रही हैं। हजारों परिवारों ने इनके मार्गदर्शन में भक्तामर साधना द्वारा मानसिक तनाव, भावनात्मक असंतुलन, स्वास्थ्य चुनौतियों और जीवन की विविध समस्याओं में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव किया है।
मुख्य अतिथि माननीय श्री निकुंज गुरुजी ने अपने प्रेरक उद्बोधन में संस्थापिकाओं के सेवा-भाव, अनुशासन और
आध्यात्मिक समर्पण की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि यह कें द्र केवल एक संस्था नहीं, बल्कि विश्वास, संतुलन और आंतरिक परिवर्तन का जीवंत तीर्थ है। उन्होंने आगामी वर्षों में इसे वैश्विक स्तर तक पहुँचाने के संकल्प की सराहना करते हुए पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।
कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता श्री राजेश सुराना ने अपने शोधपरक और प्रभावशाली वक्तव्य में जैन दर्शन और आधुनिक
विज्ञान के अद्भुत सामंजस्य को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि जैन दर्शन का मूल सिद्धांत “भावों का सीधा प्रभाव मनुष्य के मन-मस्तिष्क और शरीर पर पड़ता है” – आज मेडिकल साइंस, न्यूरोसाइंस, मनोविज्ञान और आयुर्वेद के शोधों द्वारा प्रमाणित हो रहा है
उन्होंने तनाव पर Hans Selye के शोधों का उल्लेख करते हुए बताया कि दीर्घकालिक तनाव शरीर में हार्मोनल असंतुलन उत्पन्न कर उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और प्रतिरक्षा कमजोरी का कारण बन सकता है
डॉ. कैं डेस पर्ट के न्यूरोपेप्टाइड्स संबंधी शोधों का संदर्भ देते हुए उन्होंने समझाया कि भावनाएँ शरीर में रासायनिक
परिवर्तन उत्पन्न करती हैं
ध्यान पर हुए अध्ययनों से मस्तिष्क की संरचना में सकारात्मक बदलाव और करुणा-साधना से प्रतिरक्षा प्रणाली के सुदृढ़ होने के प्रमाण भी प्रस्तुत किए गए
उन्होंने आचारांग सूत्र और तत्त्वार्थसूत्र के संदर्भ में स्पष्ट किया कि राग-द्वेष से कर्मबंधन होता है और अज्ञान-मोह से कषाय उत्पन्न होते हैं
आधुनिक विज्ञान जहाँ “माइंड-ब्रेन-इम्युनिटी” की बात करता है, वहीं जैन दर्शन हजारों वर्ष पूर्व “भाव-शुद्धि” को स्वास्थ्य का मूल आधार मान चुका है।
इस विशेष अवसर पर देश-विदेश से ऑनलाइन जुड़े अनेकों साधकों एवं सदस्यों ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में बताया कि किस प्रकार कें द्र की साधिकाओं द्वारा किए गए भक्तामर अनुष्ठान और हीलिंग मार्गदर्शन से उन्हें मानसिक शांति, भावनात्मक स्थिरता और जीवन की जटिल समस्याओं में आश्चर्यजनक समाधान प्राप्त हुए। कई परिवारों ने अपने स्वास्थ्य, पारिवारिक समरसता और आत्मिक संतुलन में आए सकारात्मक परिवर्तन को सार्वजनिक रूप से साझा करते हुए कें द्र के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त की।
श्री सुराना ने अपने 18 वर्षों के अनुभव के आधार पर बताया कि भक्तामर स्तोत्र केवल पाठ नहीं, बल्कि भाव-परिवर्तन की वैज्ञानिक साधना प्रक्रिया है गाथाओं के शुद्ध उच्चारण, गूढ़ भावों के चिंतन और सामूहिक साधना के माध्यम से कषाय शमन, मानसिक संतुलन, आत्मिक उन्नति तथा समग्र स्वास्थ्य में व्यापक परिवर्तन संभव है।
आदिनाथ भक्तामर हीलिंग सेंटर आज भाव-शोधन, चेतना संतुलन और आध्यात्मिक उपचार का सशक्त केंद्र बन चुका है। नियमित अनुष्ठान, सामूहिक साधना, भाव-परिवर्तन कार्यशालाएँ और व्यक्तिगत मार्गदर्शन सत्रों के माध्यम से यह कें द्र लोगों को भय से अभय, अशांति से संतुलन और कषाय से करुणा की ओर अग्रसर कर रहा है।
पाँच वर्षों की यह यात्रा उपलब्धि मात्र नहीं, बल्कि एक व्यापक संकल्प की शुरुआत है। घर-घर भक्तामर की दिव्य ऊर्जा पहुँचाना और समाज को आंतरिक स्वास्थ्य एवं चेतना के विज्ञान से जोड़ना इन समर्पित साधिकाओं के जीवन का ध्येय बन चुका है।
कार्यक्रम का समापन मंगल भावनाओं के साथ हुआ कि यह प्रकाश और अधिक जीवनों को आलोकित करे तथा विज्ञान और जैन दर्शन का यह संगम विश्वव्यापी कल्याण का माध्यम बने।

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