हिंसा के शस्त्र से नहीं, प्रेम के शास्त्र से जीवन के प्रश्नों का समाधान : वीरायतन के आचार्य चन्दना जी का विश्व को शांति संदेश !

मुंबई, आज जब विश्व के कई हिस्सों में युद्ध, हिंसा और तनाव का वातावरण है, तब मानवता को सबसे अधिक आवश्यकता शांति, करुणा और सह-अस्तित्व के संदेश की है। ऐसे विकट समय में पद्मश्री से सम्मानित जैन साध्वी आचार्य श्री चन्दना जी का रचनात्मक जीवन और उनका अहिंसा तथा संवाद का संदेश मानवता को एक नई दिशा प्रदान करता है। उनका चिंतन हमें यह स्मरण कराता है कि मानव जाति का वास्तविक मार्ग संघर्ष और विनाश नहीं, बल्कि अहिंसा, सह-अस्तित्व और संवाद का है।

प्रतिष्ठित संस्था वीरायतन की आचार्य श्री चन्दना जी ने अपने शांति संदेश कहा कि जीवन के जटिल प्रश्नों का समाधान हिंसा के शस्त्र से नहीं, बल्कि प्रेम के शास्त्र से ही संभव है। इतिहास इसका साक्षी है कि युद्ध से कभी भी स्थायी समाधान नहीं मिलता। युद्ध केवल विनाश, पीड़ा, असुरक्षा और स्थायी वैमनस्य को ही जन्म देता है। युद्ध की आग में मानवता की संवेदनाए झुलस जाती है और समाज में भय तथा अस्थिरता का वातावरण बन जाता है।

उन्होने कहा कि, अक्सर यह देखा गया है कि देशों और उनके राजनेताओं के अहंकार, प्रतिस्पर्धा या सत्ता की आकांक्षा के कारण युद्ध की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, परंतु उसका सबसे अधिक कष्ट सामान्य जनता को ही सहना पड़ता है। निर्दोष नागरिकों का जीवन संकट में पड़ जाता है, परिवार बिखर जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों के मन पर उसके गहरे घाव रह जाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि विश्व समुदाय इतिहास से बोध लेकर हिंसा के मार्ग को त्यागे और शांति के मार्ग को अपनाए।

भगवान महावीर के अहिंसा के सिद्धांत को लेकर आचार्य चन्दना जी ने कहा कि आज के समय में पहले से भी अधिक अहिंसा का यह सिद्धांत प्रासंगिक हो गया है। अहिंसा केवल किसी को शारीरिक रूप से आहत न करने का नाम नहीं है, बल्कि यह विचारों, शब्दों और व्यवहार में भी करुणा, संवेदना और संयम को अपनाने का मार्ग है। जब हमारे हृदय में मैत्री, सहानुभूति और सह-अस्तित्व की भावना विकसीत होती है तभी सच्चे अर्थो में शांति का वातावरण बन सकता है।

आचार्य चन्दना जी ने प्रेरणा देते हुए कहा हैं कि किसी भी संघर्ष का स्थायी समाधान परस्पर संवाद, समझ और सौहार्द से ही संभव है। जब राष्ट्र और समाज संवेदनशील वार्ता, पारस्परिक सम्मान और विश्वास के आधार पर समस्याओं का समाधान खोजते हैं, तब शांति की स्थायी नींव रखी जा सकती है। संवाद ही वह सेतु है जो वैमनस्य तथा द्वेष को दूर कर सकता है और अविश्वास को विश्वास में बदल सकता है। आज आवश्यकता है कि विश्व के नेता, नीति-निर्माता और समाज के सभी वर्ग अहिंसा, संवाद और विवेक के मार्ग को अपनाएँ। यही मार्ग मानवता को विनाश से बचाकर शांति, सहयोग और उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जा सकता है। यदि विश्व को सचमुच सुरक्षित और शांतिपूर्ण बनाना है, तो हमें युद्ध की भाषा छोड़कर अहिंसा और करुणा की भाषा सीखनी होगी।

Leave a Comment