भारत की अयोध्या नगरी में जब महाराज ऋषभदेव का शासन था, तब एक नए युग का सूत्रपात हो रहा था। राजा ऋषभदेव केवल एक शासक नहीं, बल्कि सभ्यता के शिल्पकार थे। आपके आंगन में दो कलियां खिली थीं— ब्राह्मी और सुन्दरी।
शिक्षा का संकल्प
उस युग में जब समाज की नींव रखी जा रही थी, ऋषभदेवजी का मानना था कि “एक शिक्षित पुरुष केवल स्वयं को सुधारता है, लेकिन एक शिक्षित स्त्री पूरे वंश को संस्कारित करती है।” आपने अपनी पुत्री ब्राह्मी को स्वयं शिक्षा दी। ब्राह्मी ने मात्र अक्षर ज्ञान ही नहीं, बल्कि १८ लिपियों और ६४ कलाओं में महारत हासिल की।
आज हम जिसे ‘ब्राह्मी लिपि’ कहते हैं, वह उन्हीं के नाम से अमर हुई। पिता ने जब देखा कि उनकी पुत्री ज्ञान का अथाह सागर बन चुकी है, तो उन्होंने नारी-शिक्षा की पूरी कमान ब्राह्मी को सौंप दी।
राजसी वैभव से वैराग्य की ओर
समय का चक्र घूमा और पिता ऋषभदेव ने दीक्षा ग्रहण कर ली। जब ऋषभदेव भगवान को ‘केवलज्ञान’ प्राप्त हुआ, तो उनके दिव्य उपदेशों ने ब्राह्मी के हृदय को झकझोर दिया। उन्हें समझ आया कि सांसारिक विद्या जीवन जीने के लिए जरूरी है, लेकिन ‘आत्म-विद्या’ मोक्ष के लिए अनिवार्य है।
राजकुमारी ब्राह्मी ने रेशमी वस्त्र त्याग दिए और संयम का मार्ग चुन लिया। उनके त्याग को देखकर हजारों अन्य नारियों ने भी धर्म की राह पकड़ी। भगवान ऋषभदेव ने उन सभी साध्वियों के मार्गदर्शन का उत्तरदायित्व ब्राह्मी जी को ही सौंपा।
अंतिम संदेश : यतना का जीवन
महासती ब्राह्मीजी का जीवन एक खुली किताब बन गया। आपका जीवन सिखाता है कि शिक्षा केवल डिग्री पाने का नाम नहीं है, बल्कि अपने भीतर की आँखों को खोल देने का नाम है। भगवान ऋषभदेव की हर शिक्षा का पालन करते हुए अपनी आत्मा का उन्होंने कल्याण किया और वह सिद्ध बुद्ध और मुक्त हो गई।
निष्कर्ष :
महासती ब्राह्मीजी ने न केवल खुद को मोक्ष के द्वार तक पहुँचाया, बल्कि करोड़ों भटके हुए इंसानों को सही मार्ग दिखाया। उनका जीवन आज की आधुनिक नारी के लिए भी सबसे बड़ी प्रेरणा है।