श्रावस्ती के महाराज जितशत्रु का प्रिय पुत्र स्कन्दककुमार बचपन से ही बड़ा श्रद्धालु और धर्मप्रेमी था। एक समय मित्र-राज्य से वहां के मन्त्री पालक कार्यवश श्रावस्ती में महाराज के पास आये हुए थे। राजकार्य के बाद मन्त्री ने राजसभा में धर्मचर्चा चलाई और बोले – “स्वर्ग, नरक, आत्मा, पुण्य, पाप आदि कुछ भी नहीं हैं। धर्माचार्यों की सारी बातें कल्पित एवं ढोंग हैं।”
स्कन्दककुमार को यह चर्चा पसन्द नहीं आयी और उन्होंने मन्त्री के साथ खुला प्रतिवाद किया तथा युक्तिपूर्वक मन्त्री के कथन का खण्डन किया।
कुमार स्कन्दक के मुख से आत्मा, परमात्मा एवं परलोक आदि का सयुक्ति अस्तित्व कथन सुनकर सारे सभासद प्रसन्न हो उठे तथा राजकुमार की बात को सत्य मानने लगे। पालक का पक्ष किसी को भी पसन्द नहीं आया । फलतः लज्जित होकर पालक वहां से चला गया और मन में राजकुमार से बदला लेने की सोचकर चला गया ।
कुछ समय के बाद भगवान मुनिसुव्रत का श्रावस्ती में पधारना हुआ। राजकुमार स्कन्दक भी नगरजनों के साथ प्रभु-वन्दन को गया और उपदेश सुन कर संसार से विरक्त हो गया। उसने पांचसौ राजकुमारों के साथ भगवान के चरणों में संयम धारण कर लिया और विनयपूर्वक ज्ञानाचरण की शिक्षा लेकर निर्मलभाव से तप करने लगा।
एक दिन स्कन्दकमुनि ने भगवान से जनपद में विहार करने की अनुमति माँगी | प्रभु ने कहा- ” स्कन्दक! विहार में अनिष्ट की सम्भावना है । तुम्हारे पाँच सौ शिष्य आराधक हो जाएंगे पर तुम्हारा कल्याण नहीं होगा ।” स्कन्दकमुनि ने भावावेश में प्रभु की बात का ध्यान नहीं करते हुए दण्डकारण्य की ओर विहार कर दिया ।
पाँचसौ मुनियों के संग ग्रामानुग्राम विचरते हुए स्कन्दकमुनि दण्डकारण्य पहुँच गये। नगर के बाहर उद्यान में आचार्य के विराजने की खबर से राजा और मन्त्री पालक मुनि के दर्शन को गये। मुनि को देखते ही मन्त्री का वैर जाग उठा। उसने बाग के चारों ओर अस्त्र-शस्त्र गड़वा दिये और अवसर देखकर राजा को मुनि के षड्यन्त्र की झूठी बात कह सुनायी। राजा ने गुप्त जाँच करवाई तथा जाना कि मन्त्री की बात सही प्रतीत हो रही है। उन्होंने मन्त्री को खुली आज्ञा प्रदान कर दी कि, इन षड्यन्त्री साधुओं को मनचाहा दण्ड दे। अब क्या था—‘‘बन्दर को बिच्छू डसा और मदिरा पिला दो” वाली कहावती सही हो गयी । मन्त्री ने क्रोधावेश में आज्ञा दी कि, बगीचे के पास घाणी लगाकर एक-एक साधु को उसमें पील दिया जाये ।
पापी दण्डपाल ने जब आचार्य सहित साधुओं को राजा का आदेश सुनाया तो वे अवाक् हो गये। साधुओं ने अपना परीक्षा-काल समझ कर गुरु के समक्ष आलोचना प्रतिक्रमण कर शुद्धि कर ली और अनशन के साथ अन्तिम क्षण तक समाधिभाव का धारण कर केवलज्ञान प्राप्त किया। अन्त में सबसे छोटे साधु की बारी आयी तो आचार्य ने कहा – ” पहले मुझे पील दो, इस बच्चे को मेरे सामने मत पीलो, क्योंकि इससे मुझे बड़ा दुःख होगा ।” दण्डपाल ने इस पर कुछ ध्यान नहीं दिया और छोटे मुनि को आचार्य के सामने ही पील दिया।
आचार्य स्कन्दक के शिष्यों ने भावशुद्धि के कारण घाणी में पीले जाकर भी समभाव नहीं छोड़ा और अल्पकाल में ही परम पद पा लिया। आचार्य स्कन्दक भाव की क्लिष्टता से अन्त समय में विराधक हो गये। स्कन्दकशिष्यों का आराधक पद भाव शुद्धि का ही ज्वलन्त उदाहरण है।
कहानी ‘स्कन्दकशिष्य’ से प्राप्त मुख्य शिक्षाएं
समभाव की महत्ता : शारीरिक कष्ट या मृत्यु के समय भी मन में शांति (समभाव) बनाए रखना ही सच्चा कल्याण है।
भावशुद्धि ही मोक्ष का आधार : शिष्यों ने कष्ट सहते हुए भी भावों को शुद्ध रखा और केवलज्ञान प्राप्त किया। परिणाम से अधिक भाव की पवित्रता महत्वपूर्ण है।
वैर का त्याग : मंत्री पालक का वैर भाव अंततः क्रूरता और हिंसा का कारण बना। वैर भाव हमेशा दुखदायी होता है।