निष्कलंक प्रेम और शील की शक्ति – सेठ सुदर्शन और मनोरमा !

चम्पा नगरी की कीर्ति और गौरव थे सेठ सुदर्शन। रूप, गुण और शील में उनकी जगह कोई नहीं ले सकता था और उनकी धर्मनिष्ठा की चर्चा दूर-दूर तक थी।

पर, अगर कोई सुदर्शन के जीवन की शोभा थी, तो वह थीं उनकी धर्मपरायणा पत्नी, मनोरमा। मनोरमा केवल अप्सरा-सी रूपवान नहीं थीं; वह तो ‘सोने में सुगंध’ की कहावत को जीती थीं। उनका शील और सदाचार बेजोड़ था। पांच पांडव-तुल्य, धर्मज्ञ पुत्रों के साथ, सुदर्शन का परिवार साक्षात हर्ष और उत्कर्ष का रंगस्थल बन गया था।

वासना का विष और धर्म की ढाल
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन, काम की पुतली महारानी अभिया की नज़र सुदर्शन पर पड़ी। उनके रूप-लावण्य पर मोहित होकर, रानी ने उन्हें महल में बुलाया और वासना पूर्ति की याचना की

लेकिन, धर्मप्राण सेठ सुदर्शन के लिए, उनका शील ही उनका कवच था। उन्होंने महारानी के अधर्म प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

अनादर से जलकर, रानी अभिया ने भयानक प्रतिशोध लिया। उसने सेठ सुदर्शन पर बलात्कार का झूठा आरोप लगाया। इस कुटिल प्रपंच का परिणाम अत्यंत कठोर था: सुदर्शन को शूली की सज़ा सुनाई गई।

नगरी में हाहाकार और पत्नी का अटल विश्वास

जब यह समाचार नगर में फैला, तो सब हक्के-बक्के रह गए। ‘अरे! क्या वह धर्मात्मा सेठ ऐसा नीच कर्म कर सकता है?’ किसी के गले यह बात नहीं उतरी। राजाज्ञा का विरोध करने की हिम्मत किसी में न थी।

सभी नगरवासी दौड़कर मनोरमा के पास आए, आंखों में आंसू लिए बोले : “देवी! आपके पतिदेव को बड़ा कठोर दंड मिला है। शायद यह अंतिम भेंट हो। जल्दी चलकर एक बार उनके दर्शन कर लीजिए।”

पर मनोरमा टस से मस न हुई।

मनोरमा का अपने पति पर पूर्ण, अकाट्य भरोसा था। वह जानती थी कि :

सूर्य अपनी दिशा बदल सकता है, समुद्र अपनी मर्यादा तोड़ सकता है, पर मेरे स्वामी स्वप्न में भी सदाचार से विमुख नहीं हो सकते!

उन्होंने दृढ़ता से सोचा: “यह पूर्व जन्म के किसी अशुभ कर्म का उदय है, जो मेरे स्वामी पर कलंक बनकर आया है। पर वे सर्वथा निष्कलंक और निष्पाप हैं। जैसे बादल सूर्य को अधिक देर नहीं ढक सकता, वैसे ही यह झूठ भी टिकेगा नहीं।”

लोगों के आश्चर्य के बीच, मनोरमा ने यह निर्णय लिया :

“मैं कलंक की दशा में उनसे भेंटकर उनके दुःखी मन को और बोझिल नहीं बनाऊंगी। जब उनका कलंक दूर होगा, मैं तभी उनका दर्शन करूंगी।”

और यह कहकर, वह शुद्ध हृदय से प्रभु के ध्यान में लीन हो गईं, अपने शील पर अडिग रहीं।

शील की महिमा : शूली का सिंहासन बनना

मनोरमा का अपने शील और पति के पवित्र सदाचार पर यह निशंक विश्वास व्यर्थ नहीं गया।

उनकी भक्ति, उनके सतीत्व और सुदर्शन के अटल शील की शक्ति ने एक चमत्कार कर दिया।

थोड़े ही समय में, एक आकाशवाणी हुई, और राजा के समक्ष, सुदर्शन को दी गई शूली, पल भर में एक दिव्य सिंहासन में परिवर्तित हो गई!

सुदर्शन के शील का प्रभाव चहुं दिशा में फैल गया। उनका कलंक मिटा और उनके शील की जय-जयकार होने लगी!

राजा और सभी प्रमुख जन पश्चाताप से भरकर, आनंदित होकर मनोरमा के पास आए। जय-जयकार के बीच, मनोरमा अपने निष्कलंक पति सुदर्शन को ससम्मान घर ले आईं।

पूरे नगर में आनंद छा गया और हर ओर सुदर्शन और मनोरमा के शील की महिमा गाई जाने लगी।

यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा विश्वास, अडिग शील और धर्मनिष्ठा हर संकट पर विजय पा सकती है। सत्य को दबाया जा सकता है, पर मिटाया नहीं जा सकता।

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