मुनि मेतार्य का संयम – जब मौन ने बदला किसान का हृदय !

मेतार्य एक युवा जैन मुनि थे। वे अभी-अभी दीक्षा लेकर तपस्या कर रहे थे। एक दिन वे एक गाँव के पास ध्यान में बैठे थे।

उसी गाँव में एक किसान रहता था — बहुत क्रोधी स्वभाव का। किसी ने उसे बता दिया कि उसकी बकरी खोई हुई है और एक मुनि उसी रास्ते पर ध्यान कर रहे हैं।

किसान दौड़ता हुआ आया। उसने मुनि से पूछा — “मेरी बकरी कहाँ गई?”

मुनि ध्यान में थे, उन्होंने जवाब नहीं दिया।

किसान का क्रोध बढ़ा। उसने मुनि के कान में चिल्लाया — “बहरे हो क्या? मेरी बकरी!”

मुनि ने धीरे से आँखें खोलीं और शांत भाव से देखा।

किसान और भड़क गया। उसने सोचा — यह मुनि जानता है और बता नहीं रहा। उसने मुनि के बाल खींचे, धक्के दिए, गालियाँ दीं।

मुनि ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। न क्रोध, न दुख, न शिकायत।

कुछ देर बाद किसान खुद शांत हुआ। उसे शर्म आई। वो बोला — “मुनिराज, मुझे माफ करो। मुझे नहीं पता था।”

मुनि ने मुस्कुराकर कहा — “भाई, मैं जानता था कि तुम्हारी बकरी उस पेड़ के पीछे है। पर मैं मौन व्रत में था — बोल नहीं सकता था। और तुम्हारे क्रोध के लिए — कोई बात नहीं। तुम्हें अपनी बकरी की चिंता थी — यह तुम्हारा प्रेम था।”

किसान की आँखें भर आईं। उसने पूछा — “मुनिराज, मैंने आपको इतना कष्ट दिया — आपको गुस्सा क्यों नहीं आया?”

मुनि ने कहा — “क्रोध वो आग है जो दूसरे को जलाने से पहले खुद को जलाती है। मैंने वो आग अपने भीतर जलाने से इनकार किया।”

उस दिन के बाद वो किसान बदल गया। उसने भी संयम का रास्ता चुना।

शिक्षा : संयम और समता का अर्थ यह नहीं कि हम कमज़ोर हैं। बल्कि जो इंद्रियों और मन पर नियंत्रण रख सके, वही सबसे शक्तिशाली है।

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