जब जुनून बना सफलता का मंत्र –
डॉ. पंकज जैन की ‘ले छलांग’ !
झारखंड के हज़ारीबाग की मिट्टी में पला-बढ़ा एक साधारण सा बालक, जिसके दादाजी कभी राजस्थान की गलियों में फेरी लगाया करते थे।
यह कहानी है हज़ारीबाग की मिट्टी में पले-बढ़े एक साधारण से बालक की। जिनके दादाजी राजस्थान की गलियों से झारखंड आए थे — लगभग खाली हाथ, लेकिन इरादे इतने मज़बूत कि अकेले दम पर एक कारोबार की नींव रख दी। यही विरासत, यही मूल्य, और वही संघर्ष की भावना पंकज जी के व्यक्तित्व में उतर आई — और फिर उन्होंने उसे एक वैश्विक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया।
नियति उन्हें झारखंड खींच लाई, जहाँ उनके पिता ने एक छोटी सी हार्डवेयर की दुकान खोली। मगर, बिहार और झारखंड के विभाजन की मार ने उनके जीवन में आर्थिक संघर्षों का अँधेरा घोल दिया।
उनके पिता ने ‘जैन मेटल्स’ नाम से एक हार्डवेयर की दुकान शुरू की थी। लेकिन बिहार और झारखंड के विभाजन, और व्यापार में आए उतार-चढ़ाव ने परिवार की आर्थिक स्थिरता को गहरा प्रभावित किया।
उस बालक का नाम था पंकज, जिसे अपने माता-पिता से अनमोल संस्कार विरासत में मिले थे। घर में भले ही आर्थिक तंगी का साया था, पर स्नेह और अपनत्व की धूप हमेशा खिली रहती थी।
पिता की आँखों में एक सपना पल रहा था – उनका बेटा पढ़ेगा और जीवन में बहुत आगे बढ़ेगा।
पंकज जी चार भाई-बहनों में सबसे बड़े थे, और उनके पिता की आँखों में एक ही सपना पल रहा था — कि उनके सभी बच्चे पढ़-लिखकर जीवन में ऊँचाइयाँ छुएँ।
पंकज की प्रतिभा ने उन्हें पिलानी के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज (स्कूल) में पहुंचा दिया। जब युवा पंकज ने अपने पिता को अपनी पढ़ाई के लिए चार हज़ार रुपयों का कर्ज़ माँगते देखा, तो उनका हृदय पीड़ा से भर गया।
पंकज की प्रतिभा ने उन्हें पिलानी के प्रतिष्ठित स्कूल तक पहुँचा दिया। लेकिन जब युवा पंकज ने अपने पिता को सालाना फीस चुकाने के लिए एक छोटी-सी रकम के लिए कर्ज़ मांगते देखा, तो उनका हृदय भीतर तक हिल गया।
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, पंकज ने झारखंड के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कॉलेज — बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मेसरा में प्रवेश लिया।
घर की आर्थिक हालत अब भी कमजोर ही थी। जेब खाली थी, यहाँ तक कि चलने के लिए अपनी साइकिल भी नहीं थी। किसी और के साथ मिलकर एक पुरानी साइकिल खरीदी।
उस अभाव के दौर में भी, पंकज ने अपनी प्रतिभा को मरने नहीं दिया और ट्रेनिंग प्रोग्राम्स लेकर कुछ सहारा जुटाते रहे।
बचपन से ही वाणी में सरस्वती का वास था, बोलने की अद्भुत कला उन्हें मानो जन्मजात से ही मिली हो।
समय का पहिया घूमा और पंकज जी की मेहनत रंग लाई।
स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड के ट्रेनिंग डिपार्टमेंट में उन्हें नौकरी मिली। तेरह वर्षों तक उन्होंने निष्ठा से काम किया और एक सम्मानजनक मुकाम हासिल किया। फिर, एक नया मोड़ आया। महिंद्रा में उन्होंने पूरे भारत में सेल्स एंड मार्केटिंग के दूसरे सबसे बड़े पद को सुशोभित किया।
स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड के सेल्स एंड मार्केटिंग विभाग में उन्हें नौकरी मिली। तेरह वर्षों तक उन्होंने निष्ठा से काम किया और एक सम्मानजनक मुकाम हासिल किया। फिर एक नया मोड़ आया — महिंद्रा में उन्होंने पूरे भारत में सेल्स एंड मार्केटिंग के दूसरे सबसे बड़े पद को सुशोभित किया।
लेकिन, पंकजजी का मन कहीं और रमता था। जीवन की आपाधापी में, जब लोग रिटायरमेंट की योजनाएँ बनाते हैं, तब करियर के 26 वर्ष के बाद पंकजजी ने एक साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने अपने परिवार से बात की और अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने की इच्छा व्यक्त की।
सेकंड हाईएस्ट पेड पोजीशन को छोड़कर, उनके भीतर कुछ कर गुजरने का जुनून हिलोरें मार रहा था।
भारत की स्टील इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा कमाने वालों में होने के बाद भी, पंकज के दिल में कुछ अपना करने का जुनून लगातार उठ रहा था।
जीवन के 48 वें वर्ष में डॉ. पंकजजी जैन ने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने का संकल्प लिया। एवं उम्र के 53 वें वर्ष में उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी की।
पिछले छह वर्षों से, आपने एक नया व्यापार शुरू किया। आपकी कंपनी, जिसमें 40 लोग कार्यरत हैं, आज भारत में स्पेशल स्टील डीलर में लगभग शीर्ष स्थान पर है। वे एक एग्रीगेटर के रूप में काम करते हैं, सामान रखते हैं और फिर उसे बेचते हैं।
कड़ी मेहनत और अपने कर्मचारियों के प्रति अटूट स्नेह और पारिवारिक बंधन के कारण, आपका व्यवसाय पहले दिन से ही लाभ में है।
आप व्यावहारिक रूप से जैन सिद्धांतों का पालन करते हैं। जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं, कीमतें बदलती हैं, लेन-देन का आकार बड़ा होता है, लेकिन उन्होंने अपने व्यवसाय में सफलता की नई ऊँचाइयों को छुआ है।
आप व्यावहारिक रूप से जैन सिद्धांतों का पालन करते हैं। जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं, कीमतें बदलती हैं, लेन-देन का आकार बड़ा होता है, लेकिन उन्होंने अपने व्यवसाय में सफलता की नई ऊँचाइयों को छुआ है। जैन मूल्यों को आत्मसात करते हुए, कंपनी के हर सदस्य ने यह संकल्प लिया है कि न तो झूठ बोलेंगे और न ही ऐसे किसी व्यापार में भाग लेंगे जहाँ नकद लेन-देन होता हो। यह पूरी तरह से सिस्टम-ड्रिवन कंपनी है, जहाँ ईमानदारी और पारदर्शिता ही सबसे बड़ी पूंजी है।
इसी अनुभव और जीवन के गहरे ज्ञान को उन्होंने अपनी अद्भुत किताब “ले छलांग” में उतारा है। यह किताब आपके अनुभवों का सार है, उस दिव्य ज्ञान की झलक है जो आपको प्राप्त हुआ। आज आप कई विश्वविद्यालय और कॉलेज से जुड़े हुए हैं, युवाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित करते हैं और भारत को एक स्टार्टअप राष्ट्र बनाने के सपने को साकार करने में अपना योगदान दे रहे हैं।
आपका कहना है कि ले छलांग किताब लोगों को व्यवसाय में सफल होने में मदद करने का एक माध्यम है।
आप शिक्षकों को प्रशिक्षण देते हैं और बताते हैं कि आज के युग में शिक्षा में क्या परिवर्तन आने चाहिए।
आपने कई संस्थानों और विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग स्थापित किया है, ताकि ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जा सके और भविष्य के शैक्षणिक कार्यक्रमों व पाठ्यक्रमों में आवश्यक सुधार लाए जा सकें। आप मानते हैं कि आज के युग में शिक्षा में बदलाव समय की माँग है।
डॉ. पंकजजी जैन जीतो अपेक्स मेंटरशिप वर्टिकल के नेशनल कन्वेनर हैं। आपके लेख विदेशों में भी प्रकाशित हुए हैं, वियतनाम, थाईलैंड, सिंगापुर जैसे देशों की पत्रिकाओं में आपके विचारों को स्थान मिला है।
आपकी कर्मठता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आप अकेले 24 घंटों में से 15 से 20 घंटे काम कर सकते हैं।
डॉ. पंकज जी जैन की यह कहानी सचमुच प्रेरणादायक है। विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए उन्होंने जिस तरह सफलता की ऊँचाइयों को छुआ, वह काबिलेतारिफ है।
जैन परम्परा परिवार की ओर से आपके उज्वल भविष्य की हार्दिक शुभकामनाएं !