प्रदेशी एक शक्तिशाली राजा था। वो नास्तिक था – उसका मानना था कि आत्मा जैसी कोई चीज़ नहीं होती। शरीर के साथ सब कुछ खत्म हो जाता है।
एक दिन उसके राज्य में केशी कुमारश्रमण नाम के एक जैन मुनि पधारे। राजा ने सोचा – इस मुनि से बहस करके इसकी बातें गलत साबित करूँगा।
राजा ने पूछा – “मुनिराज, तुम कहते हो आत्मा होती है। पर मैंने तो कभी नहीं देखी। साबित करो।”
मुनि शांत रहे। फिर उन्होंने एक सवाल पूछा – “राजन, जब तुम सोते हो, तो सपने देखते हो?”
राजा ने कहा – “हाँ।”
“सपने में तुम कहाँ जाते हो?”
“पता नहीं… दूर-दूर के स्थानों पर।”
“पर तुम्हारा शरीर तो बिस्तर पर ही होता है। तो जो सपने में गया — वो क्या था?”
राजा सोच में पड़ गया।
मुनि ने आगे कहा – “राजन, जब कोई मर जाता है, तो शरीर वैसा ही रहता है- हाथ, पाँव, आँखें सब हैं। पर वो ‘कुछ’ जो था – जो बोलता था, सोचता था, प्रेम करता था- वो कहाँ गया? वो कुछ था – जो अदृश्य था। उसी को आत्मा कहते हैं।”
राजा के पास जवाब नहीं था।
मुनि ने एक और उदाहरण दिया – “राजन, हवा दिखती है क्या?”
“नहीं।”
“पर महसूस होती है?”
“हाँ।”
“तो क्या हवा का अस्तित्व नहीं है?”
राजा चुप हो गया। उसने पहली बार महसूस किया कि जो दिखता नहीं, वो होता ज़रूर है।
धीरे-धीरे राजा ने जैन दर्शन को समझा। उसने माना कि आत्मा है, कर्म है, और मोक्ष का रास्ता है। उसने राज्य में जीव दया का प्रचार किया, वधस्थल बंद करवाए।
शिक्षा : जैन दर्शन तर्क और अनुभव दोनों पर आधारित है। भगवान महावीर ने आत्मा को महसूस करने का रास्ता बताया — और वो रास्ता है भीतर की ओर देखना।