मधुर वचनों का ज़हर –जब मित्रता की परख हुई !

एक समय की बात है, एक चतुर व्यक्ति था ‘मधुकर’। उसकी वाणी में शहद-सी मिठास थी, जो किसी को भी आसानी से अपना बना लेती थी। उसकी इस मीठी जुबान का सबसे बड़ा शिकार था उसका सीधा-सादा और सरल हृदय मित्र ‘सत्यपाल’। सत्यपाल दुनिया को अपनी ही तरह सच्चा और मददगार समझता था।

मधुकर ने कई बार बड़ी बड़ी मुश्किलें बताकर सत्यपाल से पैसे लिए थे—कभी पांच लाख, तो कभी सात लाख रुपये। सत्यपाल हमेशा यही सोचता कि वह आज सक्षम है, तो मित्र की सहायता क्यों न करे। जब मधुकर सहयोग पाकर खुशी से झूम उठता, तो सत्यपाल की अपनी खुशी दस गुना बढ़ जाती।

किस्मत का पहिया घूमा। एक दिन सत्यपाल एक बड़ी आर्थिक परेशानी में फंस गया। उसे लगा कि अब उसे अपने उस पक्के मित्र के सहयोग की सख़्त ज़रूरत है, जिसकी उसने हमेशा मदद की है। उसके मन में तनिक भी संदेह नहीं था। उसने सोचा, “जिसके लिए मैंने इतना किया, वह तो मेरी एक आवाज़ पर सब कुछ न्यौछावर कर देगा। आख़िर हमारा रिश्ता कितना गहरा है!”

कड़वी सच्चाई

सत्यपाल ने तुरंत कॉल किया। बात शुरू हुई। जब तक सत्यपाल ने मधुकर का हाल-चाल पूछा, तब तक मधुकर बड़े उत्साह और आत्मीयता से बात करता रहा। लेकिन जैसे ही सत्यपाल ने हिचकिचाते हुए कहा:

“मित्र, मैं आज थोड़ी मुश्किल में हूं…. मुझे कुछ पैसों की ज़रूरत है।”

मधुकर के लहजे में अचानक ठंडक आ गई। उसने तुरंत कहा, “क्या? क्या कह रहे हो सत्यपाल? ज़रा ज़ोर से बोलो! आवाज़ साफ़ नहीं आ रही है!”

सत्यपाल ने अपनी पूरी ताक़त लगाकर कहा: “मुझे… पाँच लाख… की ज़रूरत है!”

मधुकर ने और ज़ोर से कहा: “माफ़ करना, कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है! लगता है लाइन में ख़राबी है!”

सत्यपाल और उसके पड़ोसी को यह सब अजीब लगा। अभी तक तो सब ठीक था! पड़ोसी ने स्थिति को संभालने के लिए बीच में हस्तक्षेप किया और मधुकर से कहा, “भाई! आपके मित्र पाँच लाख रुपये माँग रहे हैं।”

मधुकर के जवाब ने सत्यपाल को तोड़ दिया। मधुकर ने सत्यपाल के पड़ोसी से कहा: “भाई एक्सचेंज वाले! मुझे तो यह सुनाई नहीं दे रहा कि पांच लाख उसे चाहिए! अगर तुम्हें सुनाई दे रहा है, तो तुम ही उसे दे दो!”

यह सुनकर सत्यपाल ने एक गहरी सांस ली और उदास मन से फोन रख दिया। उसे अब सारी बात समझ आ गई थी। मीठे बोल और झूठी आत्मीयता सिर्फ़ सहयोग लेने का एक माध्यम मात्र थी।

💡 कहानी की शिक्षा

“सहयोग लेना हर कोई चाहता है, पर समय आने पर निस्वार्थ सहयोग करने का साहस बहुत कम लोगों में होता है। मीठे बोल अक्सर स्वार्थ का मुखौटा होते हैं। इसलिए, अपने रिश्तों को परखने के लिए संकट के समय का इंतज़ार करें।”

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