प्रभु परमात्मा ने कुछ ऐसे सूत्र हमें दिए हैं जो हमारा जीवन बदल सकते हैं। कोई भी हमारे घर पर आये तो कभी उसे ना मत कहो । समय हमारे पास बहोत है पर कहां देना और कहां नहीं ये हम नहीं समझते। जिनशासन को पाकर जिनवाणी के मूल्य को हमने नहीं समझा तो हीरे से भी मूल्यवान जैन धर्म पाकर हमने कुछ भी हासिल नहीं किया। जिनशासन हमारे लिए वरदान भी है और समाधान भी है। हमेशा हमें देने की भावना बढ़ानी है। क्योंकि जो हम देते हैं वही पाते हैं। दान जब भी दे छिपाकर दे, ना है कि छपाकर।
धर्म से ज्यादा समय हम धन को कमाने में लगाते है। सब कुछ हमे बडो की मेहरबानी से मिला है। इसलिए देने में कभी ना मत कहिए। कहां देना है, कहां नहीं ये सोच कर देना है। याद रहे, दान मोक्ष मार्ग की पहली सीढ़ी है।
धर्म आराधना में समय देंगे, तभी अपना जीवन सफल होगा। सेवा करने में भी कभी ना मत कहिए। सेवा किजिए। सेवा करोगे तभी तो मेवा मिलेगा। सेवा के लिए मन में अहोभाव लाइए, सेवा के लिए जीवन समर्पित कीजिए। सेवा करते हुए उनके गुणगान गाइए। सेवा करोगे तो पुण्य बढेगा। जिसकी सेवा कर रहे है उनकी प्रशंसा कीजिए।
शबरी के जीवन में पूर्व भव के संस्कार थे। शबरी कि सगाई हुई और शादी होनेवाली थी, पर मुक प्राणियों के प्रति अनुकंपा के भाव थे, उसने देखा इतने बकरे उसकी शादी के लिए बली चढने वाले है। तो वो रात मे ही घर से निकल गईऔर मातंगऋषि के आश्रम के वहां आई। ऋषि रोज नदी पर जाते और जाने के पहले शबरी रास्ता और कुटिया साफ करती थी। ऋषि ने एक दिन देखा और शबरी को कहा देखो अब मेरी साधना पूर्णतः की ओर है और तुम याद रखना यहां राम पधारेंगे। तो वह शबरी बाल से युवा, युवा से प्रौढ़ और प्रौढ़ से वृद्ध अवस्था में आई। तब शबरी का इंतजार खत्म हुआ और शबरी की कुटिया में राम पधारे।
राम ने शबरी को जीवन सफल बनाने के सूत्र बताएं। सत्संग ऐसी फैक्ट्री है, जो बुरे को अच्छा बनाती है और अच्छे को सच्चा बनाती है। संतो की सत्संग आत्मा में शीतलता प्रदान करती है। सतयुग वह है जहां दुर्जन अगर सज्जन के संपर्क में आए तो वह भी सज्जन बन जाता है, वही कलयुग वह है, जहां सज्जन अगर दुर्जन के संपर्क में आए तो वह भी दुर्जन बन जाता है। यह पंचम आरा है, जहां बुरा रंग चढ़ने में देरी नहीं लगती है। कोई रेत के जैसा सत्संग करते है, जो फिक्स नहीं होता। कोई मिट्टी के जैसे, जो थोड़ी देर में ही पिघल जाता है। तो कोई शक्कर के जैसा सत्संग करते है, जो उसमें पूरी तरह से घुल मिल जाता है। सत्संग अपने जीवन को बदलता है। सत्संग से वास्तव में सच्चा सुख प्राप्त होता है।
स्मार्ट ग्रुप में नहीं हार्ड ग्रुप में रहना सीखिए। साधु संत हार्ड ग्रुप में है। यहां आप कंफर्टेबल होते हो। आपको यहां पर कुछ ना कुछ सीखने के लिए अवश्य मिलेगा और परमात्मा के वचनों को हाथ जोड़कर स्वीकार करेंगे तो आचरण से जीवन बदलेगा।
जिनशासन प्रभाविका प. पू. चैतन्यश्रीजी म. सा.,
साधना सदन, महावीर प्रतिष्ठान,
सेलिसबरी पार्क, पुणे