पन्नालाल जी गंगवाल का संथारा व्रत ( सल्लेखना ) के साथ देह त्याग !

हमारे जितो के पीसीएमसी पुणे के पॅट्रॉन मेम्बर श्री महेंद्र जी गंगवाल इन के पिताजी श्री पन्नालाल जी ने दिगम्बर जैन परंपरा के अनुसार, सल्लेखना व्रत विधी के साथ , शांत परिणामों में , अपने जीवन की शाम प्रभू के चरणों में समर्पित कर दी !

श्री पन्नालाल जी का जन्म ६ जून १९३१ मे कन्नड ग्राम जिला औरंगाबाद ( संभाजीनगर ) मे हुआ. अत्यंत गरीब परिस्थिती के बावजूद धर्म मार्ग मे टिके रहे, संपूर्ण जीवन उन्होंने व्रत संयम का पालन किया । उन्होंने अपने जीवन काल मे चौदाह वर्ष का अनंत व्रत और पाच वर्ष का पंचमेरू व्रत किया, हर अष्टमी, चतुर्दशी को वे संयम के साथ एकासन करते थे । भारत के हर तीर्थ क्षेत्र, सिद्ध क्षेत्र, अतिशय क्षेत्र की वंदना की । हर वर्ष लगातार ५० वर्ष से अधिक वे कन्नड से कचनेर की पैदल यात्रा उन्होंने की । बच्चो को जैन धर्म संस्कार मिले इसलिए गुरुकुल मे पढाया ।

उनकी अंतिम इच्छा थी के मेरा सल्लेखना पूर्वक समाधी मरण प्राप्त हो, उनकी इच्छा का आदर रखते हूए, गंगवाल परिवार ने गुरुदेव के सानिध्य मे उन्हे सल्लेखना देने का निश्चय किया ,सौभाग्य से मुनिश्री कुंथुसागर जी गुरुदेव भी नजदिक के वाकड परिसर मे विराजमान थे, उन्हे इस बारे मे बताया, उन्होंने पन्नालालजी को संभोधीत किया और गंगवाल परिवार ने विधी पूर्वक उनका गृहत्याग कराया, १९ जनवरी को गुरु के चरणो मे सल्लेखना धारण की और २४ जनवरी को शांत परिणामो के साथ अपना देह त्याग दिया।

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