कंधे पर भाई का शव और आँखों में उम्मीद – एक अटूट प्रेम की करुण कथा !

भाई के मोह में बंधा एक देव-हृदय: श्रीकृष्ण की विदाई और बलभद्र का महात्याग !

जब द्वारिका नगरी अपनी भव्यता के शिखर पर थी, वहां भगवान कृष्ण का न्यायप्रिय शासन था. एक समय, मुनि दीपायन के गहरे क्रोध के कारण, द्वारिका नगरी का विनाश निश्चित हो गया. विनाश की उस घड़ी में, श्रीकृष्ण अपने माता-पिता को सुरक्षित निकालने के लिए नगरी से बाहर निकले. लेकिन, विधि का विधान कुछ और ही था. अचानक महल के दरवाज़े की छत ढह गई और उनके माता-पिता उसमें दबकर स्वर्ग सिधार गए.
माता-पिता को खोने के गहरे दुख में डूबे श्रीकृष्ण, अपने भाई बलभद्र के साथ आगे बढ़ते रहे.

रेगिस्तान की तपती दुपहरी, चिलचिलाती धूप, और गले में भयानक प्यास – दुःख जैसे हर तरफ से घेर रहा था. वे एक वट वृक्ष (बरगद के पेड़) के नीचे थोड़ा सुस्ताने रुके.

बलभद्रजी, अपने भाई की प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश में गए. तभी वहां एक शिकारी आया, जिसका नाम जराकुमार था. वह शिकार की खोज में था. उसे लगा कि श्रीकृष्ण कोई हिरण हैं और उसने निशाना साधकर तीर चला दिया. वह तीर श्रीकृष्ण को लग गया, और इस तरह वह महान आत्मा भी इस नश्वर संसार को त्यागकर चली गई.

जब बलभद्रजी पानी लेकर लौटे, तो वहां का दृश्य देखकर सन्न रह गए. वह पानी कौन पीता? पानी पिलाने वाला तो उन्हें छोड़कर, हमेशा के लिए जा चुका था. बलभद्र के लिए यह विश्वास करना नामुमकिन था. वे खुद को समझाने लगे – ‘शायद भाई को पानी लाने में देर हो गई, इसलिए वे मुझसे नाराज़ हैं? या फिर वे थककर गहरी नींद में सो गए हैं? कुछ देर में जब उनकी नींद खुलेगी, वे ज़रूर पानी मांगेंगे.’ मोह ने उनकी बुद्धि को ऐसा ढक लिया था कि उन्हें मृत्यु का सत्य नज़र ही नहीं आ रहा था.

इस गहरे मोह और प्रेम के वशीभूत होकर, बलभद्र ने श्रीकृष्ण के शव को अपने कंधे पर उठा लिया. वे उम्मीदों के बोझ तले, मीलों तक चलते रहे. देवता भी उनकी यह दशा देखकर करुणा से भर उठे.
फिर, बलभद्र को इस सत्य का बोध कराने के लिए एक देवता ने उपाय किया. उन्होंने एक कोल्हू में रेत भरकर उसे तेल निकालने के लिए पेरना शुरू कर दिया. यह देखकर बलभद्र चौंक गए.

वे चिल्लाए – ‘अरे! तुम यह क्या कर रहे हो? क्या रेत से कभी तेल निकलता है?’

देवता ने पलटकर जवाब दिया – ‘हे बलभद्र! अगर रेत से तेल नहीं निकल सकता, तो क्या यह मृत शरीर भी कभी फिर से जीवित हो सकता है?’

यह सुनते ही बलभद्र को जैसे गहरा धक्का लगा. उनके ऊपर से मोह का पर्दा हट गया. उन्हें समझ आ गया कि वे जिसे जीवित मान रहे हैं, वह तो बस एक बेजान शरीर है. वे इस भ्रम में थे कि उनका भाई अभी ज़िंदा है. इस सत्य को स्वीकार करते हुए, उन्होंने श्रीकृष्ण का अंतिम संस्कार किया.

श्रीकृष्ण के जाने के बाद, बलभद्र का मन संसार से पूरी तरह ऊब गया. उन्हें समझ आ गया कि यह संसार नाशवान है, और सब कुछ नश्वर है. उन्होंने संयम (जैन मुनि दीक्षा) स्वीकार कर ली, और कठोर तपस्या शुरू कर दी.

एक बार, मुनि बलभद्र एक महीने के उपवास के बाद पारणा के लिए नगर में भिक्षा मांगने निकले. वे एक बहुत ही सुंदर और तेजस्वी रूप के स्वामी थे. जब वे नगर के बाहर एक कुएं के पास से गुज़रे, तो वहां पानी भर रही महिलाएं उनके आकर्षक रूप को देखकर मंत्रमुग्ध हो गईं. वे सब उनकी सुंदरता देखने में ऐसी खो गईं कि उन्हें कुछ होश ही नहीं रहा. एक महिला तो ऐसी सुध-बुध खो बैठी कि उसने घड़े की जगह, अपने बच्चे के गले में ही रस्सी डाल दी! अन्य महिलाएं भी कुछ समझ नहीं पाईं. उन्होंने उस बहन को चेताया।

जब बलभद्र मुनि को इस बात का पता चला, तो वे बहुत दुखी हुए. उन्हें ग्लानि हुई कि उनके रूप के कारण ऐसा हो गया. उन्होंने उसी समय प्रतिज्ञा कर ली – ‘आज के बाद, मैं कभी भी भिक्षा के लिए नगर में नहीं जाऊंगा.’

वे वहां से लौट आए और नगर के पास एक उपवन (बगीचा) में ध्यान लगाकर बैठ गए. पारणा की इच्छा भी उन्होंने अपने मन से निकाल दी.

कई दिन बीत गए और मुनि बलभद्र ध्यान में लीन रहे. उनकी कठोर तपस्या और पवित्रता का प्रभाव जंगल के पशु-पक्षियों पर भी पड़ने लगा. जो जानवर एक-दूसरे के दुश्मन थे, वे भी एक-दूसरे से नफरत करना भूलकर, मुनि के तप के प्रभाव से शांत हो गए. एक हिरण तो उनका सच्चा भक्त बन गया. वह मुनि के पारणा के लिए उत्सुक रहता और आस-पास पानी की तलाश में भटकता रहता था.

एक दिन, एक लकड़ी काटने वाला कारीगर जंगल में आया. दोपहर के समय, उसकी पत्नी उसके लिए खाना लेकर आई. हिरण ने मौका देखा और मुनि बलभद्र के पास जाकर उन्हें इशारा किया. मुनि ने उस कारीगर को देखा, जो अपनी पत्नी के साथ खाना खा रहा था. वह कारीगर मुनि को देखकर बहुत खुश हुआ. उसने मुनि को आदर-पूर्वक अपने खाने में से चार रोटियां दीं. यह देखकर हिरण बहुत खुश हुआ और वह सोचने लगा कि अगर मैं भी इंसान होता, तो इसी तरह दान-धर्म कर सकता था.

कुछ समय बाद, एक तेज़ हवा का झोंका आया. एक पुराना पेड़ टूटकर उन सभी पर गिर पड़ा, और उनकी मृत्यु हो गई. वे अपने अच्छे कर्मों और पवित्र भावों के कारण, पंचम देवलोक के अधिकारी बने.

मुनि बलभद्र के साथ कारीगर और हिरण का स्वर्ग जाना, उनके उत्कृष्ट और पवित्र भावों का ही मधुर फल था.

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि:

* संसार नश्वर है: हमारे प्रियजन और सब कुछ अस्थाई है, इसलिए हमें मोह का त्याग करना चाहिए.

* सत्य को स्वीकार करें: मृत्यु और परिवर्तन ही एकमात्र सत्य है. इसे स्वीकार करना ही ज्ञान है.

* तपस्या और संयम का महत्व: तपस्या से हम अपने मन को पवित्र कर सकते हैं और वैराग्य पा सकते हैं.

* भावों की शक्ति: हमारे भाव (विचार और भावनाएं) बहुत शक्तिशाली होते हैं और वे ही हमारे कर्मों को निर्धारित करते हैं. अगर हमारे भाव पवित्र होंगे, तो परिणाम भी शुभ होंगे.

* जीव दया: हमें सभी जीवों पर दया और प्रेम रखना चाहिए.

मुनि बलभद्र की तरह, हमें भी मोह का त्याग कर, सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए और सभी जीवों पर दया भाव रखना चाहिए. उनकी यह प्रेरक कहानी हमें आत्म-कल्याण और मोक्ष की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है.

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