दिल को झकझोर देनेवाली वृद्धाश्रम की कहानी!

आज आपके माता-पिता, कल आप : वृद्धाश्रम का चक्रव्यूह !

वृद्धाश्रम की वो आखिरी आह: जब जीते-जी मर गई औलाद की ममता !

रेखा सारा काम निपटा कर बैठी ही थी कि । तभी फोन की घंटी बजने लगी । मेरठ से विमला चाची ने फोन पर कहा- ‘बिटिया अपने बाबूजी को आकर ले जाओ यहाँ से । बहुत बीमार रहने लगे है, बहुत कमजोर भी हो गए हैं। हम भी कोई जवान तो हो नहीं रहें है, अब उनका करना भी बहुत मुश्किल होता जा रहा है। वैसे भी आखिरी समय अपने बच्चों के साथ बिताना चाहिए।’ रेखा बोली- ‘ठीक है चाचीजी, इस रविवार को आते हैं, बाबूजी को हम दिल्ली ले आएगें ।’ फिर इधर-उधर की बातें करके फोन काट दिया। बाबूजी तीन के तीन भाई है, सभी भाई पुश्तैनी मकान में ही रहते हैं।

रेखा और उसका छोटा भाई अंकित दिल्ली में अपने-अपने परिवार के साथ रहते हैं। तीन चार साल पहले अंकित को फ्लॅट खरीदने के लिए पैसों की आवश्यकता पड़ी, तो बाबूजी ने भाइयों से मकान के अपने एक तिहाई हिस्से का पैसा लेकर उसमें से अपने खाने-पहनने के लिए रखकर बाकि अंकित को दे दिया था। वे दिल्ली आना नहीं चाहते थे, इसलिए एक छोटा-सा कमरा रख लिया था। जब तक जीवित रहे तब तक के लिए। रेखा को लगता था कि अम्मा के जाने के बाद बाबूजी बिलकुल अकेले पड़ गए होंगे। लेकिन वहाँ पुराने परिचितों के बीच उनका मन लगा रहता था। दोनों चाचियाँ भी उनका ध्यान रखती थी। दिल्ली में दोनों भाई-बहन की गृहस्थी भी अच्छे से चल रही थी।

रविवार को रेखा और अंकित का ही कार्यक्रम बन पाया मेरठ जाने का। रेखा के पति एक व्यस्त डॉक्टर है, उसकी लाखों की कमाई महीने भर की । इस तरह से छुट्टी लेकर निकलना उसके लिए बहुत मुश्किल है। मरीजों की बीमारी न रविवार देखती है न सोमवार। अंकित की पत्नी अंकिता की अपनी जिन्दगी है, उच्चवर्गीय परिवारों में उसका उठना-बैठना है। उसे इस तरह छोटे-मोटे पारिवारिक पचड़ों में पड़ना पसन्द नहीं ।

रेखा को लगा कि अंकित रास्ते भर कुछ अनमना, गुमसुम सा बैठा है। वह बोली- ‘इतना परेशान मत हो, ऐसी कोई चिंता की बात नहीं है, बाबूजी की उम्र हो रही है, थोड़े कमजोर हो गए हैं, ठीक हो जाएंगे।’ अंकित झिझकते हुए बोला- ‘अच्छा खासा चल रहा था, पता नहीं चाचाजी को ऐसी क्या मुसीबत आ गई कि दो-चार साल और बाबूजी को रख लेते। अब तो मकानों के दाम आसमान छू रहे हैं, तब कितने कम पैसों में अपने नाम करवा लिया तीसरा हिस्सा । ‘

रेखा उसे शान्त करने की मंशा से बोली- ‘ठीक है न, उस समय बाजार के जितने भाव थे उस हिसाब से दे दिए और बाबूजी आखिरी समय अपने बच्चों के साथ बिताएँगे तो उन्हें भी ‘अच्छा लगेगा। ‘

अंकित उत्तेजित होकर बोला- ‘दीदी! तेरे’ लिए यह सब कहना बहुत आसान है। तीन कमरों के फ्लॅट में कहाँ रखूँगा उन्हें अंकिता से किट किट होगी सो अलग, उसने तो साफ मना कर दिया है कि वह बाबूजी का कोई काम नहीं करेंगी। वैसे तो दीदी, लड़कियाँ हक़ मांगने तो बड़ी जल्दी खड़ी हो जाती हैं, करने के नाम पर वे पीछे क्यों हट जाती है। आजकल लड़कियों की शिक्षा और शादी में अच्छा खासा पैसा खर्च हो जाता है। तू क्यों नहीं ले जाती बाबूजी को अपने घर, इतनी बड़ी कोठी है, लाखों की कमाई जिमाजी के ? ‘ रेखा को अंकित का इस तरह से बोलना ठीक नहीं लगा। बाबूजी से पैसे लेते समय तो कैसे वादे कर रहा था कि आपको किसी भी वस्तु की आवश्यकता हो तो आप निःसंकोच फोन कर देना, मैं तुरन्त आ जाऊँगा। बस ? इस समय हाथ थोड़ा सा तंग है।’ नाम मात्र पैसे छोड़े थे बाबूजी के पास और फिर कभी फटका भी नहीं उनकी सुध लेने।

रेखा ने उसे शान्त करते हुए कहा- ‘तू चिंता मत कर मैं ले जाऊँगी बाबूजी को अपने घर ।’ सही भी है उसे क्या परेशानी, इतना बड़ा घर फिर पति रात-दिन मरीजों की सेवा में रहते है। अपने पिता तुल्य ससुर को आश्रम तो दे ही सकते है। बाबूजी को देखकर उसकी आँखें भर आई। इतने दुबले और बेबस दिख रहे थे, गले लगते हुए वह बोली- ‘पहले फोन करवा देते तो पहले लेने आ जाती । ‘

बाबूजी बोले-‘तुम्हारी अपनी जिंदगी है, क्या परेशान करता। वैसे भी दिल्ली में बिलकुल तुम लोगों पर आश्रित हो जाऊँगा । ”

रात को रेखा का पति राहूल देर से आया तब तक बच्चे भी सो चुके थे। खाना खाने के बाद सुकून से बैठते हुए रेखा ने राहूल से कहा – ‘बाबूजी को मैं यहाँ ले आई हूँ। अंकित का घर बहुत छोटा है, उसे उन्हें रखने में थोड़ी परेशानी होगी । ‘

राहूल के तेवर एकदम बदल गए और उसने सख्त लहजे में कहा – ‘यहाँ ले आई हूँ से क्या मतलब है तुम्हारा ? तुम्हारे पिताजी तुम्हारे भाई की जिम्मेदारी है। मैंने बड़ा घर वृद्धाश्रम खोलने के लिए नहीं अपने रहने के लिए बनवाया है। जायदाद के पैसे हड़पते हुए नहीं सोचा था साले साहब ने कि पिताजी की सेवा भी करनी पड़ेगी । रात-दिन मेहनत करके पैसा कमाता हूँ, फालतू लुटाने के लिए नहीं है मेरे पास । ‘
रेखा अपने पति के इस रूप से अनभिज्ञ थी, उसने कहा’रात-दिन मरीजों की सेवा करते हो, मेरे पिताजी के लिए क्या आपके घर और दिल में इतना सा स्थान भी नहीं है । ‘

राहूल के चेहरे की नसें तनीं हुई थीं, वह लगभग चीखते हुए बोला- ‘मरीज बीमार पड़ते है तो अपने इलाज के लिए मुझे पैसा देते है। यह एक व्यापारिक समझौता है, इसमें सेवा जैसा कुछ
भी नहीं है। यह मेरा काम है, मेरी रोजी-रोटी है। बेहतर होगा कि तुम एक-दो दिन में अपने पिता को अंकित के घर छोड़ आओ ।’ रेखा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था । जिस पति की वह इतनी इज्जत करती है वें ऐसा बोल सकते हैं। क्यों उसने अपने भाई और पति पर इतना विश्वास किया? क्यों उसने शुरू से ही एक-एक पैसे का हिसाब नहीं रखा? अच्छी खासी नौकरी करती थी वह, पहले पुत्र के जन्म पर राहूल ने यह कहकर नौकरी छुड़वा दी कि मैं इतना अच्छा कमाता हूँ तो तुम्हें नौकरी करने की क्या आवश्यकता है। तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं रहेगी, आराम से घर में रहकर बच्चों की देखभाल करो। वह आज नौकरी कर रही होती तो उसके पास कुछ अलग से पैसे होते, उसके पास मा दस साल से घर में पूरे दिन काम करने के बदले में पैसे की मांग करती तो इतने तो हो ही जाते कि पिताजी की देखभाल अपने दम पर कर पाती । कहने को तो हर महीने बैंक में उसके नाम से पैसे जमा होते हैं, लेकिन उन्हें खर्च करने की उसे राहूल से बिना पूछे इजाजत नहीं थी ।

मन कह रहा था कि भाई से भी कह दे कि शादी में जो खर्च हुआ था वह निकालकर जो बचता है उसका आधा-आधा दे। कम-से-कम पिताजी इज्जत से तो जी पाएंगे। पति और भाई दोनों को एक पंक्ति में खड़ा करके बहुत से सवाल करने का उसका मन कर रहा था। वह जानती थी इनके जवाब कुछ न कुछ अवश्य होंगे। लेकिन इन सवाल-जवाब में रिश्तों की परतें दर परतें उखड़ जाएगी और जो नग्नता सामने आएगी उसके बाद रिश्ते ढोनें मुश्किल हो जाएंगे। सामने तस्वीर में से झांकती दो जोड़ी आँखें जिह्वा पर ताला डाल रही थी।

अगले दिन राहूल के अस्पताल जाने के बाद जब नाश्ता लेकर रेखा बाबूजी के पास पहुँची तो वे समान बाँधे बैठे थे। उदासी भरे स्वर में वे बोले – ‘मेरे कारण अपनी गृहस्थी मत खराब कर बेटा। पता नहीं कितने दिन है मेरे पास। मैंने इस वृद्धाश्रम में बात कर ली है, जितने पैसे मेरे पास है, उसमें मुझे वे लोग रखने को तैयार है। ये ले उनका पता और तू मुझे वहाँ छोड़ आ, और निश्चित होकर अपनी गृहस्थी सम्भाल । ‘ रेखा समझ गई कि बाबूजी की देह कमजोर हो गई है, दिमाग नहीं ।
वह अपने बाबूजी को क्या सफाई देती कि दामाद अस्पताल जाने से पहले उनसे मिलने भी नहीं आया, साफ बात है कि ससुर का आना उसे अच्छा नहीं लगा। उसने चुपचाप टेक्सी बुलाकर उनके दिए हुए पते पर उन्हें छोड़ने को चल दी। नज़रे नहीं मिला पा रही थी बाबूजी से और न कुछ बोलते बन रहा था ।

बाबूजी ने उसका हाथ दबाते हुए कहा – ‘परेशान मत हो बेटा, परिस्थितियों पर कब हमारा बस चलता है। मैं यहाँ अपने हम उम्र के लोगों के बीच खुश रहूँगा।’

तीन दिन हो गए थे बाबूजी को वृद्धाश्रम छोड़कर आए हुए । रेखा का मन न तो किसी से बोलने को हो रहा था और न ही कुछ खाने का। फोन करके भी पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी उसकी की बाबूजी कैसे हैं ? इतनी ग्लानि हो रही थी उसे कि किस मुँह से पूछे ?

एक दिन वृद्धाश्रम से ही फोन आया कि बाबूजी अब इस दुनिया में नहीं रहे। उस वक्त दस बजे थे। बच्चे पिकनिक पर गए हुए थे और रात को आठ-नौ बजे तक आएंगे। राहूल तो आते ही रात को दस बजे तक है। किसी की भी दिनचर्या पर कोई असर नहीं पड़ेगा, किसी को सूचना भी क्या देना। अंकित ऑफिस चला गया होगा, बेकार उसे भी छूट्टी लेनी पड़ेगी। पूरे रास्ते भर अवरिल अश्रु धारा बहती रही, कहना मुश्किल था। पिता के जाने के गम में मा अपनी बेबसी पर आखिरी समय पर पिता के लिए कुछ नहीं कर पायी। तीन दिन केवल तीन दिन राहूल ने उसके पिता को मान और आश्रय दे दिया होता, तो वह हृदय से राहूल को परमेश्वर मान लेती। वृद्धाश्रम के संचालक महोदय के साथ मिलकर उसने औपचारिकताएँ पूर्ण की। वह बोल रहे थे-‘इनके बेटे-बहू और दामाद भी है रिकार्ड के हिसाब से। उनको भी सूचना दे देते तो अच्छा रहता।’

वह कुछ सम्भल चुकी थी, फिर बोली ‘नहीं इनका कोई नहीं है। न बहू, न बेटा और न दामाद । बस एक बेटी है वह भी नाम के लिए।

संचालक महोदय अपनी ही धुन में बोल रहे थे – ‘परिवार वालों को सांत्वना और बाबूजी की आत्मा को शांति मिले।’ रेखा सोच रही थी कि बाबूजी की आत्मा को शांति मिल ही गई होगी। जाने से पहले सबसे मोह भंग हो गया था। समझ गये होंगे कि कोई किसी का नहीं होता, फिर क्यों आत्मा अशान्त होगी। हाँ, परमात्मा उसको इतनी शक्ति दें, कि किसी तरह वह बहन और पत्नी का रिश्ता निभा सकें।

मित्रों! यदि आपकी आँखों में आँसू आ रहे है तो उन्हें रोकिए मत। ये आपके इन्सान होने का सबूत है। यह कहानी अपने आस-पास की ही है। क्या इन्सान इसलिये बच्चे पैदा करता है कि जिन्दगी के अन्तिम पड़ाव में उसे अकेले किसी वृद्धाश्रम में आखरी सांस लेनी पड़ेगी। यदि बच्चे ऐसे ही होते है । तो खुशनसीब हैं वो लोग जिनके बच्चे नहीं है। हजारों-लाखों में मुट्ठी भर हैं वो माँ-बाप, जिनके बच्चे उनकी इज्जत करते हैं, जिनसे उनको मान-सम्मान मिलता है। नई पीढ़ी के लोगों को अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि आपके बच्चे भी आपको देख रहे हैं। जो आज आप अपने माता- पिता को दे रहे हैं, कल वहीं आपके बच्चों द्वारा ब्याज सहित लौटकर आपके पास आयेगा ।

संकलन : राजीव नेपालिया (माथुर )

 

 

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