पुणे, पर्युषण, जैन धर्म का महापर्व, इस बार न सिर्फ एक उत्सव के रूप में आया है, बल्कि स्वयं को जानने और सुधारने के एक अवसर के रूप में भी। जिनशासन प्रभाविका प. पू. चैतन्यश्रीजी म. सा. ने इस पर्व को ‘पर्वों का राजा’ बताते हुए इसे मेहमान की तरह नहीं, बल्कि एक स्वजन की तरह अपनाने का आह्वान किया है। आपके अनुसार, यह पर्व हमें भविष्य की दिशा दिखाता है और अतीत की गलतियों का अवलोकन करने का मौका देता है। यह पर्व हमारी आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक है।
पर्व : प्रभु से संबंध और गलतियों का सुधार
प. पू. चैतन्यश्रीजी म. सा. ने पर्व की परिभाषा देते हुए कहा, “पर्व वो है जो प्रभु से हमारा संबंध जोड़े और हमारी गलतियों का सुधार करे, तभी सद्गुणों का संग्रह होगा।” उन्होंने इसे परमात्मा की उपासना और आत्मा की साधना का माध्यम बताया। यह पर्व हमारे भीतर दया, करुणा, सरलता और विनम्रता जैसे सद्गुणों को जागृत करने का समय है। यह एक ऐसा “न्यू वर्जन” है जिसे हमें अपने भीतर स्थापित करना है।
स्वयं को ढूंढें : ‘मैं कौन हूँ?
पर्युषण के आठ दिन आत्म-मंथन के लिए हैं। प. पू. चैतन्यश्रीजी म. सा. ने बताया कि इन आठ दिनों में हमें स्वयं से लड़ना है और अपनी आत्मा को जीतना है। उन्होंने सबको अपनी ओर ध्यान केंद्रित करने और खुद को ढूंढने का आग्रह किया। “मैं कौन हूं? मैं किसके नाम से जाना जाता हूं ?” – ऐसे प्रश्न हमें अपने वास्तविक अस्तित्व का बोध कराते हैं। यह समय है पापों को छोड़ने और धर्म को अपनाने का, क्योंकि “पाप आज नहीं छोडूं तो कब और धर्म आज नहीं करूं तो कब?”
प्रतिक्रमण : हिंसा के युग में पश्चाताप का मार्ग
आज के हिंसक और कलहपूर्ण युग में प्रतिक्रमण का महत्व और भी बढ़ जाता है। प. पू. चैतन्यश्रीजी म. सा. ने प्रतिक्रमण को “लगे हुए पापों की आलोचना” बताया। यह हमारी आत्मा को परमात्मा से जुड़े रहने में मदद करता है। राजा श्रेणिक ने मिथ्यात्व का प्रतिक्रमण किया। इसी तरह, राजा परदेसी ने अपने अंतिम 39 दिनों में धर्म को जाना और बेले-बेले पारणा किया। यहां तक कि चंडकौशिक नाग जैसे क्रोधी जीव ने भी अपने जीवन के अंत में प्रतिक्रमण करके मोक्ष प्राप्त किया।
तपस्या और त्याग : भोग के युग में संयम
आज का युग भोग का युग है। Zomato, Swiggy जैसी सेवाओं ने हमारे खाने-पीने की आदतों को बिगाड़ दिया है। लोग बिना सोचे-समझे, होटल्स में कुछ भी खा रहे हैं, जिससे उनकी सेहत और धर्म दोनों प्रभावित हो रहे हैं। प. पू. चैतन्यश्रीजी म. सा. ने इस दौरान तपस्या और त्याग के महत्व को दिया। आपश्री ने कहा कि यह समय है अपने भोगों पर नियंत्रण रखने का।
पश्चात्ताप और क्षमा: वात्सल्य में कोई भेद न हो
आलोचना, पश्चाताप और प्रायश्चित पर्युषण के महत्वपूर्ण अंग हैं। प. पू. चैतन्यश्रीजी म. सा. ने बताया, “जिसके मन में पश्चाताप नहीं, उसको प्रायश्चित करने का हक नहीं।” आपने ‘साधर्मी भक्ति’ के महत्व पर भी प्रकाश डाला, जिसमें हम सभी की मदद के लिए आभार व्यक्त करते हैं। आपने सबको एक सूत्र दिया: “साधना में कोई खेद न हो, भावना में छेद न हो और वात्सल्य में कोई भेद न हो।”
प. पू. चैतन्यश्रीजी म. सा. ने साधना सदन महावीर प्रतिष्ठान में सभी को पर्वाधिराज पर्युषण की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि इस पर्व में हमें तप-त्याग के साथ परमात्मा जैसा बनने का प्रयास करना चाहिए। यह पर्व हमारी आत्मा का परमात्मा से संबंध मजबूत करने का अवसर है।