एक राजा के दरबार में दूर-दूर से पंडित और विद्वान आते थे। एक बार राजा ने एक अनोखी परीक्षा रखी।
उन्होंने छह विद्वानों को बुलाया — जो जन्म से दृष्टिहीन थे। उनके सामने एक हाथी लाया गया।
पहले विद्वान ने हाथी का पाँव छुआ — “यह एक खंभे जैसा है।”
दूसरे ने सूँड छुई — “नहीं, यह एक मोटे साँप जैसा है।”
तीसरे ने कान छुआ — “यह एक बड़े पंखे जैसा है।”
चौथे ने पेट छुआ — “यह एक दीवार जैसा है।”
पाँचवें ने पूँछ छुई — “यह एक रस्सी जैसा है।”
छठे ने दाँत छुए — “यह एक भाले जैसा है।”
सब एक-दूसरे से बहस करने लगे। हर कोई अपने आप को सही और दूसरे को गलत बता रहा था।
तभी दरबार में एक जैन मुनि आए। राजा ने उनसे इस विवाद को सुलझाने को कहा।
मुनि ने शांति से कहा — “राजन, ये सभी विद्वान सही हैं।”
सब चौंक गए।
मुनि ने समझाया — “जिसने पाँव छुआ, उसने हाथी का एक सच बताया। जिसने सूँड छुई, उसने दूसरा सच बताया। हर एक ने अपने अनुभव से सच बोला। गलती यह नहीं कि उन्होंने गलत देखा — गलती यह है कि उन्होंने सोचा कि सिर्फ मेरा देखा ही पूरा सच है।”
राजा ने पूछा — “तो पूरा सच क्या है?”
मुनि ने कहा — “पूरा सच तब दिखता है जब हम सबके अनुभवों को जोड़ते हैं। यही अनेकांत है — सत्य के अनेक पहलू होते हैं। और जो इसे समझ ले, वो कभी व्यर्थ की बहस में नहीं पड़ता।”
उस दिन के बाद राजा ने हर फैसला लेने से पहले सभी पक्षों की बात सुनना शुरू किया। उसका राज्य और भी खुशहाल हो गया।
शिक्षा – जब हम सिर्फ अपनी बात को सही मानते हैं, तो हम उस दृष्टिहीन पंडित जैसे होते हैं जिसने सिर्फ पूँछ पकड़ी और पूरे हाथी को रस्सी मान लिया। महावीर का अनेकांत हमें सिखाता है — सुनो, समझो, फिर बोलो। अनेकांतवाद की यह कहानी हमें सिखाती है कि सत्य के कई पहलू होते हैं और दूसरों के दृष्टिकोण का सम्मान करना ही वास्तविक बुद्धिमानी है।